ये सच है! सँभल जाइए!
आज हमें अपने बच्चों के स्वभाव के विषय में यह समझना होगा कि गए ज़माने जब मार खाकर भी बच्चा पापा-मम्मी ही कहता था।
अब देर नहीं लगती जब आपसे-हमसे वो मुँह फेर लेता है गलत संगत में भटक जाता है तो आज भरोसा करने के साथ-साथ बच्चे पर निगाह रखना, पकड़ बनाए रखना सबसे ज़रूरी काम हो गया है।
उदाहरणार्थ, मेरे विद्यार्थी जो कि सभी टीनेजर्स हैं, तो अडोलोसैंस से गुज़रते हुए उनमें से अनेक को बहुत-सी स्वाभाविक, मानसिक और भावनात्मक दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, जिनमें से कुछ मुझे सब शेयर करते हैं, जबकि शारीरिक परिवर्तनों को तो वो झेल ही रहे होते हैं, साथ ही कुछ हार्मोंस भी उनके भीतर तूफ़ान खड़े किए होते हैं। ये सारे बदलाव मिलकर आज के बालक के भविष्य की दिशा तय करते देते हैं और आप और हम सोचते हैं कि ये सामान्य बात है।
ऐसे में उनपर स्नेहपूर्ण ध्यान देने और उनके साथ होने की ज़रूरत होती है न कि सिर्फ़ टोकने-डाँटने की।
हमारे ज़माने मे हमें अडोलोसैंस कब आया और आकर गुज़र गया हमें पता भी नहीं चला 😧 न हममें तब ego जैसी चीज़ का प्रादुर्भाव हुआ था न किसी तरह के भटकाव की ओर हम गए मगर आज स्थितियाँ भयावह हैं।
मुझे बच्चों के बदलते व्यवहार और सोच को लेकर बहुत चिंता रहती है इसलिए मैं उनका पर्याप्त ध्यान रखती हूँ, एक दोस्त की तरह बातों-बातों में सही-गलत का फर्क समझाती हूँ क्योंकि उन्हें भी डाँटने वाले माता-पिता और उपदेश सुनाने वाले टीचर की बात नहीं सुननी होती है। अतः उन्हें अटेंशन चाहिए होती है तब उनके विचारों को सुनने के लिए मैं उपलब्ध रहती हूँ ऐसे में उन्हें विश्वास में लेकर उनका पथ प्रदर्शित कर पाती हूँ ।
यही बात PTM में जब उनके अभिभावकों को समझाती हूँ तो
वे भी सब मुझपर ही डाल देते हैं कि हमारी कुछ नहीं सुनते, बच्चे जवाब देते हैं हमें , आपको ज़्यादा मानते हैं तो आपकी बात सुन लेंगे।आप ही समझाओ मैडम! 😒
ऐसे में मेरी जिम्मेदारी दोहरी हो जाती है!
पिछले 18 वर्षों से मैं इसी उम्र के बच्चों के मध्य हूँ, हर वर्ष बच्चों के व्यवहार में जो बदलाव आ रहे हैं मुझे चिंता में डाल देते हैं,
लेकिन एक मात्र संस्कार ऐसी चीज़ है जो कभी साथ नहीं छोड़ते तभी उन्हें मेरी या अपने अभिभावकों कही सही बातों की कद्र हो पाती है।
फिर देर-सवेर बच्चे सँभल जाते हैं।
और असल खुशी मुझे तब होती है जब वे मुझे भूलते नहीं, एक समय के बाद आकर मेरे प्रति कृतज्ञता जताते हैं , मुझसे संपर्क में रहते हैं, बहुत मान देते हैं वही जिन्हें टोका या डाँटा गया था, बार-बार समझाया गया था।
कमोबेश,यह स्थिति मेरे साथ ही नहीं, लगभग हर टीचर के साथ है और मैं देख पा रही हूँ कि चुनौतियों के साथ सब अपना कर्त्तव्य अपनी क्षमता के अनुसार निभा रहे हैं।
तो ये संस्कार अब खुद ब खुद बच्चों में नहीं घुसते, इसके लिए माता-पिता को और शिक्षकों को इन बच्चों को अपनी सूक्ष्म निगरानी में रखना चाहिए और मित्र की भूमिका निभाने के लिए तैयार रहना चाहिए ताकि उनकी मनःस्थिति को समझा जा सके। आज हमें अपने बच्चों को, उन बाहरी, अनजान और कुटिल लोगों को से बचाना होगा जिन्हें वे अपना मित्र समझ बैठते हैं फिर हितैषी जानकर हमसे दूर चले जाते हैं।
ये दुखद है... हर वर्ष एक या दो बच्चे हमारे देखते-देखते ऐसा कर रहे हैं, एक टीचर के लिए हर बच्चे तक पहुँच पाना बेहद मुश्किल है, अतः ऐसे में अभिभावकों को अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी। वे मात्र स्कूल भेजकर मुक्त नहीं हो सकते।
बच्चों को सही लाइन पर रख पाना तभी संभव हो पाएगा, जब वे भरोसे के साथ दृष्टि भी रखें ।✍️
#काव्याक्षरा
दिव्यदृष्टि
जून 06, 2023
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