दृश्यों के क्रम जब
अनवरत चलते हैं
तुम्हारी ही छवि से
बनते बिगड़ते हैं !
दिवास्वप्न नहीं प्रिय!
प्रेम में आसक्त हूँ!
धमनियों में तीव्रता से
बहता हुआ रक्त हूँ!
हृदय मन-मस्तिष्क
मात्र तुम्हें देखता है!
तुम्हें माँगता है!
साथ चाहता है!
#ज़िंदगी_और_मैं
#काव्याक्षरा
