यही चाहते थे न तुम
कि घड़ी दो घड़ी
मैं ठहर जाऊँ
तुम्हारे एहसासों को
अपनी स्मृति में
कहीं सहेज पाऊँ
गर रख लेते मान
तुम मेरी प्रतीक्षा का
दुखद विशाल
तो आज न समय
रीता बहता
जो बीता इस अंतराल
मुझे अब जाना होगा प्रिय!
पर इतना
फिर भी जान लो !
मेरे हृदय की
ली जैसी
कठिन परीक्षा थी तुमने
किंतु कहीं विशाल थी
मेरे नेत्रों की ईक्षा
न जाना तुमने...
#काव्याक्षरा
